देहरादून के डाट काली मंदिर का महत्व, क्यों बेहद खास है यहां पूजा करना

देहरादून का डाट काली मंदिर का महत्व (daat kali temple )बहुत अधिक है। यहां पूजा करना बेहद खास माना जाता है। देहरादून का डाट काली मंदिर केवल एक पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम भी है, जो हर साल हजारों- लाखों भक्तों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। देहरादून के डाट काली मंदिर को देहरादून की ईष्ट देवी के तौर पर भी मान्यता है। यानी देहरादून के लोग इस मंदिर में हर शुभ कार्य से पहले पूजा करते हैं।

डाट काली मंदिर का महत्व और भौगोलिक स्थिति

डाट काली मंदिर देहरादून-सहारनपुर मार्ग पर स्थित है, जो देहरादून शहर से लगभग 14 किलोमीटर दूर है। अगर आप दिल्ली से सहारनपुर होते हुए आ रहे हैं तो एक तरह से यही देहरादून का प्रवेश द्वार भी है। यानी देहरादून में प्रवेश से पहले आप मां डाट काली के मंदिर में शीश झुकाना होगा। शिवालिक पहाड़ियों के बीच एक सुरम्य घाटी में स्थित यह मंदिर, अपनी शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से मन को मोह लेता है। इस स्थान को स्थानीय लोग "डाट" कहते हैं, जिसका अर्थ एक प्रकार का द्वार या दर्रा होता है, क्योंकि यह मंदिर देहरादून घाटी और बाहरी दुनिया के बीच एक प्राकृतिक प्रवेश द्वार पर स्थित है।

डाट काली मंदिर का इतिहास और किंवदंतियां

डाट काली मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और यह कई लोक कथाओं और किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि यह मंदिर देवी काली को समर्पित है, जो शक्ति और विनाश की देवी हैं। एक प्रमुख किंवदंती के अनुसार, जब देवी काली ने राक्षसों का संहार किया और उनका क्रोध शांत नहीं हुआ, तो भगवान शिव उनके सामने लेट गए। जब देवी ने शिव को देखा, तो वे शांत हो गईं और उनकी जीभ बाहर आ गई। कहा जाता है कि इस स्थान पर देवी काली का डाट (मुंह) पड़ा था, जिससे इस मंदिर का नाम डाट काली पड़ा।

अंग्रेज अफसर को सपने में दिखीं मां काली

मां डाट काली को लेकर जो सबसे अधिक प्रचलित किवदंती है वो इस मंदिर के पास सहारनपुर - देहरादून मार्ग पर बनी एक सुरंग से जुडी़ है। दरअसल सन 1804 में ब्रिटिश हुकूमत ने सहारनपुर से देहरादून के सड़क मार्ग का काम शुरू कराया। देहरादून में प्रवेश से पहले एक पहाड़ी ने पूरे मार्ग का रास्ता रोक रखा था। अंग्रेज अफसरों ने फैसला किया कि पहाड़ में एक सुरंग बना कर मार्ग निकाला जाएगा। इंजीनियरों की देखरेख में मजदूरों ने टनल बनाने का काम शुरू किया। मजदूर दिन भर सुरंग के लिए पहाड़ को खोदते और रास्ता बनाते। रात में सुरंग में मलबा भर जाता। सुबह मजदूर और इंजीनियर आते तो उन्हे पूरी सुरंग मलबे से भरी मिलती।

ये सिलसिला कई दिन चलता रहा। इंजीनियर और मजदूर दोनों परेशान हो गए। इसी दौरान इस सुरंग के काम में लगे एक इंजीनियर को रात में मां काली ने सपने में दर्शन दिए। कहते हैं कि मां काली ने इंजीनियर को बताया कि मलबे में उनकी पिंडी स्वरूप मूर्ति दबी हुई है। उसे निकाल कर मंदिर की स्थापना करें और उसमें पिंडी को स्थापित करें। इंजीनियर ने ये बात अपने साथियों को बताई। इसके बाद वहां तलाश की गई तो मां काली की पिंडी स्वरूप मूर्ति मिली। इस चमत्कार ने सबको हैरान कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने तुरंत वहां एक मंदिर की स्थापना के निर्देश और पिंडी को स्थापित करने और पूजा पाठ की व्यवस्था भी कराई गई।

कहते हैं कि मां काली के इस मंदिर की स्थापना के बाद सुरंग के काम में कोई बाधा नहीं आई और इंजीनियरों ने सफलता पूर्वक टनल का निर्माण पूरा किया। चूंकि मां काली के इस मंदिर ने इस मार्ग के सबके बड़े अवरोध या 'डाट' को खोल दिया था इसीलिए इस मंदिर को 'डाट काली' भी कहा जाने लगा। तभी से इस मंदिर की प्रसिद्धि आसपास के पूरे इलाके में फैल गई। मां डाट काली देहरादून की ईष्ट देवी भी मानी जाती हैं।

अफसर को मां काली ने दिए सपने में दर्शन। Image created by google gemini

मंदिर का विस्तार

डाट काली मंदिर की वास्तुकला बहुत ही साधारण लेकिन प्रभावशाली है। बताते हैं कि साल 1804 में मंदिर की स्थापना के बाद कुछ वर्षों तक मंदिर की इमारत साधारण ही रही लेकिन कुछ सालों बाद इस मंदिर को और भव्य और विशाल रूप दिया गया। मंदिर का विस्तार हुआ और लोगों की आस्था इस मंदिर में बढ़ती गई। वर्तमान में देहरादून में कोई भी नया वाहन खरीदता है तो उसे सर्वप्रथम मां डाट काली मंदिर में पूजा के लिए लाया जाता है।

मां डाट काली मंदिर में आरती का समय

डाट काली मंदिर में प्रतिदिन दो बार आरती की जाती है:

  • प्रातःकालीन आरती: सुबह लगभग 6:00 बजे
  • सायंकालीन आरती: शाम लगभग 7:00 बजे

भक्तों के लिए विशेष महत्व

डाट काली मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह श्रद्धालुओं के लिए एक चमत्कारिक मंदिर के रूप में भी पूजनीय है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विशेष रूप से नए वाहन खरीदने वाले लोग अपनी यात्रा को सुरक्षित बनाने और देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ पूजा करने आते हैं। सड़क मार्ग पर स्थित होने के कारण, कई यात्री अपनी यात्रा शुरू या समाप्त करने से पहले देवी का आशीर्वाद लेने के लिए रुकते हैं।

मां डाट काली की पुरानी सुरंग अब इतिहास की बात

जिस डाट काली की पुरानी सुरंग ने लगभग 200 सालों तक लोगों को आने जाने का रास्ता दिया अब वो इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी। दिल्ली - देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने के बाद इस सुरंग से आवागमन की जरूरत नहीं रह जाएगी। ऐसे में अब ये सुरंग किस्से कहानियों में बताई जाएगी। हालांकि कहा ये भी जा रहा है कि सरकार इस सुरंग को संरक्षित करने की तैयारियों में लगी है।

डाट काली की पुरानी सुरंग जिसे अंग्रेजों ने बनवाया था। ये सुरंग आज भी मौजूद है। हालांकि अब इस मार्ग से सामान्य आवागमन नहीं होता है। image enhanced by google gemini

Alka Tiwari

अलका तिवारी पिछले तकरीबन बीस वर्षों से पत्रकारिता से जुड़ी हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ ही अलका तिवारी प्रिंट मीडिया में भी लंबा अनुभव रखती हैं। बदलते दौर में अलका अब डिजिटल मीडिया के साथ हैं और खबरदेवभूमि.कॉम में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

---Advertisement---

Leave a Comment