उत्तराखंड की राजनीति से मंगलवार को एक ऐसा नाम हमेशा के लिए विदा हो गया, जिसे लोग सादगी, ईमानदारी और अनुशासन का प्रतीक मानते थे। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे बीसी खंडूरी का देहरादून में निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
बीसी खंडूरी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वह उन नेताओं में गिने जाते थे जिन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम माना। सेना से लेकर संसद और मुख्यमंत्री पद तक का उनका सफर अनुशासन, स्पष्ट सोच और जनसेवा की मिसाल रहा। उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद जिन नेताओं ने राज्य की राजनीति को दिशा दी, उनमें बीसी खंडूरी का नाम सबसे प्रमुख नेताओं में लिया जाता है।
सेना से राजनीति तक का सफर
भुवन चंद्र खंडूरी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 को पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा उत्तराखंड में प्राप्त की और बाद में भारतीय सेना में शामिल हुए। सेना में उन्होंने इंजीनियरिंग कोर में अपनी सेवाएं दीं और मेजर जनरल के पद तक पहुंचे। सेना में बिताए गए वर्षों ने उनके व्यक्तित्व को अनुशासन और स्पष्ट प्रशासनिक दृष्टि प्रदान की।
सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े। धीरे-धीरे वह राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा का एक बड़ा चेहरा बन गए। गढ़वाल लोकसभा सीट से कई बार सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में सड़क परिवहन, राजमार्ग एवं ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।
राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास में अहम भूमिका
बीसी खंडूरी को देश में सड़क नेटवर्क को मजबूत करने वाले नेताओं में भी याद किया जाता है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को गति दी। माना जाता है कि उनके कार्यकाल में सड़क निर्माण और कनेक्टिविटी पर विशेष फोकस किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों को बेहतर सड़क नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।
उनकी कार्यशैली का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि वह फाइलों के निस्तारण और परियोजनाओं की मॉनिटरिंग को लेकर बेहद सख्त माने जाते थे। अधिकारियों के बीच उनकी छवि एक अनुशासित और परिणाम देने वाले मंत्री की थी।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में पहचान
बीसी खंडूरी पहली बार वर्ष 2007 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। उस समय राज्य में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुस्ती और विकास की चुनौतियां प्रमुख मुद्दे थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया।
उनकी सरकार ने पारदर्शिता को बढ़ावा देने और सरकारी कार्यों में जवाबदेही तय करने की कोशिश की। यही कारण था कि आम जनता के बीच उनकी छवि एक साफ-सुथरे नेता की बनी। हालांकि, उनकी कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर कई बार मतभेद भी सामने आए, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
वर्ष 2011 में भाजपा ने एक बार फिर उन्हें राज्य की कमान सौंपी। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के प्रयास किए गए।
ईमानदारी बनी सबसे बड़ी पहचान
भारतीय राजनीति में जहां नेताओं पर अक्सर भ्रष्टाचार और निजी हितों के आरोप लगते रहे हैं, वहीं बीसी खंडूरी की छवि हमेशा एक ईमानदार नेता की रही। वह सादगीपूर्ण जीवनशैली के लिए जाने जाते थे। राजनीतिक विरोधी भी उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी की तारीफ करते थे।
उनकी कार्यशैली में सैन्य अनुशासन की झलक दिखाई देती थी। समय की पाबंदी, निर्णय लेने की क्षमता और प्रशासनिक नियंत्रण उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। यही कारण है कि उत्तराखंड के लोग उन्हें आज भी सम्मान के साथ याद करते हैं।
जनता से जुड़ा हुआ नेता
बीसी खंडूरी का जनता से जुड़ाव हमेशा मजबूत रहा। गढ़वाल क्षेत्र में उनका विशेष प्रभाव था। गांवों और दूरदराज के इलाकों में लोग उन्हें अपना नेता मानते थे। वह अक्सर जनसभाओं में कहते थे कि राजनीति का उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि केवल सत्ता प्राप्त करना।
उनके कार्यकाल में पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को लेकर कई योजनाएं बनाई गईं। पलायन की समस्या, सड़क संपर्क और रोजगार जैसे मुद्दों पर उन्होंने गंभीरता से काम करने की कोशिश की। हालांकि, सीमित संसाधनों और पहाड़ी राज्य की चुनौतियों के कारण कई योजनाएं अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकीं, लेकिन उनकी मंशा और प्रयासों को हमेशा सकारात्मक रूप में देखा गया।
राजनीतिक विरासत और परिवार
बीसी खंडूरी की राजनीतिक विरासत आज भी उत्तराखंड की राजनीति में दिखाई देती है। उनकी पुत्री ऋतु खंडूरी वर्तमान में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष के रूप में सक्रिय राजनीति में हैं। परिवार ने भी उनकी राजनीतिक और सामाजिक सोच को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
बीसी खंडूरी ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में जिस तरह की राजनीति की, वह आज के दौर में दुर्लभ मानी जाती है। उन्होंने कभी आक्रामक बयानबाजी या व्यक्तिगत हमलों की राजनीति नहीं की। उनकी राजनीति विकास, प्रशासन और अनुशासन के इर्द-गिर्द रही।
उत्तराखंड की राजनीति में एक युग का अंत
बीसी खंडूरी का निधन उत्तराखंड की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। राज्य निर्माण के बाद जिन नेताओं ने उत्तराखंड को नई पहचान देने की कोशिश की, उनमें उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। वह उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे जिनकी स्वीकार्यता पार्टी की सीमाओं से परे थी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड ने एक दूरदर्शी और ईमानदार नेता खो दिया है। आज जब उत्तराखंड और देश के लोग उन्हें याद कर रहे हैं, तब उनकी सादगी, अनुशासन और जनसेवा का भाव सबसे ज्यादा चर्चा में है। बीसी खंडूरी भले ही अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी राजनीतिक शैली, प्रशासनिक सोच और साफ छवि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।


