उत्तराखंड का अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर से पूरे देश में चर्चाओं में है। हाल ही में उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने इस हत्याकांड की जांच CBI को सौंपने की संस्तुति की है। इसके साथ ही इस मामले में दर्ज कराई गई पर्यावरणविद और पद्मश्री अनिश जोशी की FIR भी चर्चाओं में आ गई है।
अनिश जोशी ने दर्ज कराई नई FIR
पर्यावरणविद और पद्मश्री अनिश जोशी ने नौ जनवरी को देहरादून के वसंत विहार थाने में एक शिकायत दी थी। इस शिकायत में अंकिता हत्याकांड में कथित वीआईपी को सवाल उठाए गए थे। इसके साथ ही इस संबंध में जांच की जरूरत बताई गई थी। अनिल जोशी की इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने रात 9 बजकर 50 मिनट पर एक FIR दर्ज की है। इस एफआईआर में अज्ञात वीआईपी को लेकर जांच की आवश्यकता बताई गई है।
क्यों मचा है बवाल ?
अनिल जोशी के जरिए दर्ज कराई गई इस एफआईआर सवालों के घेरे में आ गई है। दरअसल इस शिकायत में अंकिता भंडारी के परिजनों को पार्टी नहीं बनाया गया है यानि ये मुकदमा अनिल जोशी, कथित अज्ञात वीआईपी और सरकार के इर्दगिर्द रहेगा और अंकिता के परिजनों के पास इस मुकदमे का कोई सिरा नहीं होगा। अगर कभी अनिल जोशी चाहें तो वो इसे वापस भी ले सकते हैं और अंकिता के परिजन कुछ नहीं कर पाएंगे सिवाए फिर से शिकायत करने के। कुल मिलाकर देखे तो जिस वीआईपी की तलाश अंकिता के परिजन और पूरा राज्य कर रहा है उसकी तलाश के लिए लिखाई गई FIR में अंकिता के परिजन पार्टी ही नहीं बनाए गए हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया अवैधानिक, सुप्रीम कोर्ट की लिखी चिट्ठी
इस पूरे प्रक्रम को लेकर उठ रहे सवालों के बीच देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता अजय शर्मा ने सीबीआई और सुप्रीम कोर्ट के साथ ही उत्तराखंड के गृह सचिव को भी चिट्ठी लिखी है। अजय शर्मा ने कई पुराने मुकदमों के हवाले से बताया है कि, स्थापित विधिक सिद्धांत है कि, जब पीड़ित अथवा उनके विधिक उत्तराधिकारी जीवित, सक्षम एवं उपलब्ध हों, तथा वही पहले से प्रकरण में सक्रिय हों, तो किसी तृतीय व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई FIR न्यायिक रूप से संदिग्ध मानी जाती है। यही नहीं उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि , किसी भी FIR पर Closure Report का विरोध/चैलेंज वही कर सकता है जो “aggrieved person” हो। डॉ. अनिल जोशी न तो पीड़ित हैं और न ही विधिक उत्तराधिकारी। अतः उनकी FIR के आधार पर भविष्य में प्रतिकूल निष्कर्ष आने पर उसे प्रभावी रूप से चुनौती देने का अधिकार संदिग्ध रहेगा जो न्याय के उद्देश्य को कमजोर करता है। यदि यह पाया जाता है कि, तृतीय व्यक्ति की FIR को असामान्य तत्परता से स्वीकार किया गया, जबकि पीड़ित जबकि पीड़ित पक्ष की वैधानिक भूमिका को दरकिनार किया गया,तो यह स्थिति —*State of Punjab v. Gurdial Singh, (1980) 2 SCC 471 के अनुसार* Colourable Exercise of Power एवं malice in law की ओर संकेत करती है। *माननीय सुप्रीम कोर्ट ने Bhagwant Singh v. Commissioner of Police, (1985) 2 SCC 537 में स्पष्ट किया है कि—Closure Report को चुनौती देने का अधिकार केवल “aggrieved person” को है।
हरीश रावत ने भी उठाए हैं सवाल
इस मसले पर तीसरे व्यक्ति की इंट्री पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता हरीश रावत ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि आखिर एक नए व्यक्ति को इस केस में लाने की क्या वैधानिक जरूरत पड़ गई जबकि इस संबंध में पहले ही जांच हो चुकी है। वहीं अंकिता के परिजनों के जरिए जो एफआईआर होनी चाहिए थी उसे अनिल जोशी के जरिए कराया गया है।



