उत्तराखंड में धामी कैबिनेट विस्तार में पांच विधायकों की लॉटरी लगी है और उन्हे मंत्री पद दिया गया है। जो पांच मंत्री बनाए गए हैं उनमें से दो ऐसे हैं जो पहले भी मंत्री रह चुके हैं। हालांकि इस बीच राजनीतिक गलियारों में उन नामों की चर्चाएं भी खूब हो रही हैं जिनका नाम लिस्ट में था लेकिन उन्हे मंत्री पद की शपथ लेने का बुलावा नहीं आया।
अमित शाह के दौरे ने बदली कहानी !
उत्तराखंड बीजेपी में पिछले काफी वक्त से कैबिनेट मंत्रियों के नामों की लिस्ट को फाइनल किया जा रहा था। हालात ये थे कि तकरीबन 12 से 18 पहले भी बीजेपी नेताओं ने ये बयान दिए कि लिस्ट फाइनल हो गई है और जल्द ही कैबिनेट विस्तार हो जाएगा। खुद मुख्यमंत्री भी एक-दो मौके पर इस बात का इशारा कर चुके थे कि नए बनाए जाने वाले कैबिनेट मंत्रियों की लिस्ट फाइनल हो चुकी है और जल्द ही ऐलान हो जाएगा। पिछले कुछ दिनों से बीजेपी में हलचल तेज हो गई थी। अरविंद पांडेय नाराज थे तो त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार पर सीधा निशाना साध रहे थे। इससे साफ हो गया था कि बीजेपी के अंदर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। हालात ये हुए कि बात दिल्ली तक पहुंच गई। इसी बीच राज्य में अमित शाह का दौरा हो गया। बताते हैं कि अमित शाह तक बीजेपी के अंदरूनी कलह की खबरें पहुंची। अमित शाह ने बंद कमरे में बुलाकर पार्टी के कई नेताओं से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की और उनसे रिपोर्ट ली। अमित शाह के हरिद्वार दौरे के दो हफ्ते के भीतर ही कैबिनेट विस्तार हो गया। ऐसा लगता है मानों अंत समय में अमित शाह ने हस्तक्षेप किया और इसके बाद पहले से तय कुछ नामों को हटाकर नए नाम लिखे गए।
फिर चूके चौहान, चमोली की भी झोली खाली
कैबिनेट में शामिल होने वाले संभावित लोगों की लिस्ट में तीन ऐसे विधायक थे जो प्रबल दावेदार माने जा रहे थे। विकासनगर से मुन्ना सिंह चौहान, धर्मपुर विधानसभा से विनोद चमोली और पुरोला से दुर्गेश्वर लाल। ये तीनों विधायक लगभग हर संभावित लिस्ट में शामिल दिख रहे थे। इसके साथ ही बिशन सिंह चुफाल और बंशीधर भगत का नाम भी संभावित मंत्रियों की लिस्ट में शामिल था। हालांकि जब लिस्ट फाइनल हुई तो इन सभी संभावितों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।
क्षेत्रीय, जातीय के साथ गुट संतुलन भी
दरअसल सियासी जानकार मान रहे हैं कि धामी कैबिनेट विस्तार में संगठन ने खासी मेहनत की और मुख्यमंत्री को गुट संतुलन के लिए राजी किया है। आमतौर पर उत्तराखंड में कैबिनेट में दो समीकरण महत्वपूर्ण होते हैं। एक है जातीय समीकरण और दूसरा क्षेत्रीय समीकरण। कुमाऊं और गढ़वाल में संतुलन बनाने के साथ मुख्य रूप से ब्राह्मण और क्षत्रीय प्रतिनिधित्व को देखा जाता है। इसके साथ ही महिला और दलित फैक्टर भी कैबिनेट में अहम होता है। लेकिन बदली राजनीतिक परिस्थितियों में इस बार सरकार और संगठन को गुट संतुलन के समीकरण भी बैठाने पड़ गए।
2027 के लिए धामी ने सबको मनाया ?
कैबिनेट विस्तार के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुटबाजी की आग को ठंडा करने और विधायकों की उम्मीदों को पूरा करने के लिए अपनी राजनीतिक जिद से तौबा किया है। यही वजह रही कि उन्होंने त्रिवेंद्र के करीबी रहे मदन कौशिक को कैबिनेट में शामिल किया है। इसके साथ ही प्रदीप बत्रा को भी मौका दिया है। धामी कैबिनेट विस्तार से भी ये साफ हो गया है कि न सिर्फ उत्तराखंड बीजेपी में चले आ रहे मनमुटाव को खत्म करने की गंभीर कोशिश हो रही है बल्कि पूरी पार्टी एकजुट होकर 2027 की ओर बढ़ रही है। हालांकि सच ये भी है कि इस कैबिनेट विस्तार को राज्य की जनता कैसे लेती है ये वक्त बताएगा।
