हरीश रावत को Back to Pavilion भेजा गया ?, कुमारी सैलजा की चिट्ठी से हड़कंप

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हरीश रावत को सैलजा की चिट्ठी

उत्तराखंड कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले एक चिट्ठी ने सियासी हलचल तेज कर दी है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता हरीश रावत को पत्र लिखकर उनकी यात्राओं और कार्यक्रमों पर सवाल खड़े किए हैं। चिट्ठी की भाषा भले ही औपचारिक और संयमित है, लेकिन इसके राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि हरीश रावत को पार्टी ने back to pavilion भेज दिया है।

सैलजा ने साफ कहा है कि हरीश रावत की यात्रा के बारे में न तो उनसे चर्चा हुई और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष को इसकी जानकारी थी। पत्र में यह भी कहा गया है कि रावत की ओर से हाल में कुछ विवादास्पद बयान दिए गए हैं और जब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, तब पार्टी को एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। ऐसे समय में पार्टी के समानांतर कोई व्यक्तिगत कार्यक्रम कांग्रेस के हित में नहीं होगा। इसलिए सैलजा ने रावत से इन कार्यक्रमों को आगे न बढ़ाने को कहा है।

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हरीश रावत यात्रा निकाल रहे थे। असली सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस नेतृत्व को रावत की राजनीतिक सक्रियता से इतनी चिंता क्यों होने लगी? सवाल ये भी है कि आखिर कुमारी सैलजा को हरीश रावत को रोकने की हिम्मत कहां से आई होगी ?

तीन महीने से उत्तराखंड से दूरी, फिर अचानक चुनावी सक्रियता

हरीश रावत पिछले कुछ समय से उत्तराखंड की सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए थे। खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने लंबा ब्रेक लिया और सितंबर में करीब तीन महीने बाद उत्तराखंड लौटे। उनकी वापसी ऐसे समय हुई जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं।

यानी जिस समय कांग्रेस को चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारना है, उसी समय रावत की प्रदेश में वापसी हुई और इसके बाद उनकी राजनीतिक गतिविधियां भी तेजी से बढ़ने लगीं।

हरदा की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि वह सिर्फ चुनाव लड़ने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क रखने वाले नेता हैं। ऐसे में उनका मैदान में उतरना अपने आप में कांग्रेस की राजनीति में एक अलग शक्ति-केंद्र के सक्रिय होने जैसा है।

और यही बात पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकती है—क्या रावत की सक्रियता कांग्रेस के लिए चुनावी ताकत बनेगी या संगठन के भीतर एक और शक्ति-केंद्र को जन्म देगी?

वापसी के दौरान शक्ति प्रदर्शन का प्रयास

हरीश रावत जब दिल्ली से उत्तराखंड वापस लौटे तो उन्होंने इसे एक इवेंट के तौर पर पेश किया। हरीश रावत और उनके समर्थकों ने इसे शक्ति प्रदर्शन के तौर पर भी दिखाने की कोशिश की। बाकायदा रोड शो निकाले गए और जगह जगह समर्थकों के जरिए स्वागत कार्यक्रम रखे गए।

दिल्ली से उत्तराखंड आने वाले रास्तों में ‘Tiger is Back’ लिखे हुए होर्डिंग लगाए गए। हरीश रावत का लुक भी बदला दिखाया गया। आमतौर पर शर्ट पैंट और वास्केट में नजर आने वाले हरीश रावत टीशर्ट और जींस में नजर आए। ऐसा दिखाने की कोशिश हुई कि हरीश रावत बिल्कुल नए जोश के साथ फिर एक बार सियासी मैदान में उतर आए हैं।

बेटे आनंद रावत की राजनीतिक दावेदारी भी महत्वपूर्ण कड़ी

हरीश रावत की मौजूदा सक्रियता को उनके परिवार की राजनीतिक संभावनाओं से अलग करके देखना भी मुश्किल लगता है। वो भी तब जब हरीश रावत इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करते दिखें।

हाल ही में हरीश रावत ने अपने बेटे आनंद रावत की विधानसभा चुनाव में दावेदारी को लेकर कहा कि टिकट का फैसला पार्टी को करना है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पार्टी को आनंद से बेहतर उम्मीदवार मिलता है तो उसे टिकट दिया जाना चाहिए।

यहीं से कांग्रेस की ‘एक परिवार, एक टिकट’ की बहस महत्वपूर्ण हो जाती है। पार्टी में इस फॉर्मूले को लेकर पहले से चर्चा रही है और रिपोर्टों के मुताबिक हरीश रावत परिवार के कई सदस्यों के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सक्रिय रहे हैं।

ऐसे में हरीश रावत का चुनावी समय में पूरे प्रदेश में सक्रिय होना केवल जनसंपर्क की कवायद है या इसके पीछे अपने राजनीतिक परिवार और समर्थक नेताओं के लिए जमीन तैयार करने की रणनीति भी है—यह सवाल कांग्रेस के भीतर उठना स्वाभाविक है।

क्या हरदा की अति सक्रियता कांग्रेस के लिए उलटी पड़ सकती है?

एक तरह से देखा जाए तो ये कांग्रेस के लिए सबसे अहम सवाल हो सकता है।

इस बात में दो राय नहीं है कि हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले चेहरों में से एक रहे हैं। इसलिए उनका सक्रिय होना पार्टी के लिए फायदे का सौदा भी हो सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब व्यक्तिगत राजनीतिक कार्यक्रम और संगठन के आधिकारिक कार्यक्रम एक-दूसरे के समानांतर दिखाई देने लगे और ऐसा लगे कि पार्टी से इतर एक और पार्टी बन गई है।

सैलजा की चिट्ठी में यही बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है—“parallel programme” यानी समानांतर कार्यक्रम और राजनीतिक रूप से इसका मतलब काफी बड़ा है।

अगर प्रदेश कांग्रेस एक दिशा में कार्यक्रम बना रही हो और पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता अपनी अलग यात्रा निकाल रहा हो, तो कार्यकर्ताओं के सामने यह सवाल पैदा हो सकता है कि वे किस कार्यक्रम को प्राथमिकता दें। इससे नेतृत्व को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है और पुराने गुटीय समीकरण फिर सक्रिय हो सकते हैं।

हरीश रावत और उत्तराखंड कांग्रेस में गुटबाजी कोई नया विषय नहीं है। पिछले कुछ महीनों में भी पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं और खेमों के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं।

इसलिए चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस हाईकमान शायद यह जोखिम नहीं लेना चाहता कि एक नेता की व्यक्तिगत लोकप्रियता पार्टी के सामूहिक चुनावी अभियान पर भारी पड़ जाए।

हरीश रावत को कुमारी सैलजा कि चिट्ठी
हरीश रावत हरिद्वार और आसपास के इलाकों में सक्रिय हो गए थे।

लेकिन सवाल यह भी—सैलजा में इतनी ‘हिम्मत’ आई कहां से?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू यही है कि आखिर कुमारी सैलजा में हरीश रावत की सियासी यात्राओं पर लगाम लगाने के लिए चिट्ठी लिखने की हिम्मत कहां से आई ?

हरीश रावत न सिर्फ उत्तराखंड कांग्रेस के बल्कि देश के वरिष्ठतम कांग्रेस नेताओं में शामिल हैं। वह मुख्यमंत्री रह चुके हैं, केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं और प्रदेश की राजनीति में दशकों से सक्रिय हैं। ऐसे नेता को यह कहना कि “आप अपना कार्यक्रम आगे न बढ़ाएं”, सामान्य संगठनात्मक निर्देश नहीं माना जा सकता।

तो फिर कुमारी सैलजा को यह कदम उठाने का राजनीतिक अधिकार और आत्मविश्वास कहां से मिला?

कहीं ऐसा तो नहीं है कि इसके पीछे पार्टी हाईकमान का समर्थन हो और पार्टी हाईकमान भी यही चाहता हो।

कुमारी सैलजा उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी हैं। यानी प्रदेश कांग्रेस में उनकी भूमिका सिर्फ सलाह देने तक सीमित नहीं है। ऐसे में उनका पत्र व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन का संदेश माना जा रहा है।

और अब घटनाक्रम इससे भी आगे बढ़ चुका है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस महासचिव संगठन के.सी. वेणुगोपाल ने भी रावत को दिल्ली बुलाया है और उनसे पार्टी संगठन के ढांचे के भीतर काम करने तथा राजनीतिक गतिविधियों में समन्वय बनाए रखने को कहा गया है।

इससे एक बात काफी स्पष्ट होती है—सैलजा अकेले नहीं बोल रही थीं। उनके पीछे कांग्रेस का केंद्रीय संगठन खड़ा दिखाई दे रहा है।

हरीश रावत के लिए क्या है संदेश ?

सैलजा की चिट्ठी को अगर राजनीतिक भाषा में पढ़ें तो इसका संदेश कुछ इस तरह समझा जा सकता है—

“आपकी लोकप्रियता और अनुभव पार्टी के लिए जरूरी हैं, लेकिन चुनाव अब संगठन के अनुशासन के साथ लड़ना होगा।”

कांग्रेस शायद हरीश रावत की उपयोगिता को नकारना नहीं चाहती। लेकिन वह यह भी नहीं चाहती कि चुनावी समय में किसी एक वरिष्ठ नेता की व्यक्तिगत राजनीतिक गतिविधियां प्रदेश संगठन के समानांतर खड़ी दिखाई दें।

हरदा के सामने अब दो रास्ते

अब हरीश रावत के सामने राजनीतिक रूप से दो रास्ते हैं।

पहला—वह इस चेतावनी को संगठनात्मक संदेश मानकर अपनी राजनीतिक गतिविधियों को प्रदेश कांग्रेस के कार्यक्रमों के साथ जोड़ दें। इससे वह पार्टी के लिए एक बड़े स्टार प्रचारक और वरिष्ठ मार्गदर्शक की भूमिका में रह सकते हैं।

दूसरा—वह अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता जारी रखते हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के भीतर यह सवाल और बड़ा होगा कि हरदा पार्टी की रणनीति के साथ चल रहे हैं या अपनी राजनीतिक जमीन के सहारे अपने बच्चों का राजनीतिक कैरियर सेट कर रहे हैं ?

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