देहरादून: उत्तराखंड कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब और दिलचस्प हो गया है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की चिट्ठी में रावत से अपनी यात्राएं आगे नहीं बढ़ाने को कहा गया था। अब हरीश रावत ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी स्थिति साफ करते हुए ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसने गेंद वापस कांग्रेस नेतृत्व के पाले में डाल दी है।
रावत ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि अगर पार्टी कोई Coordinated Programme बना रही है तो वह अपनी आगे की 8-10 यात्राएं स्थगित कर देंगे। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी सवाल किया कि जब कांग्रेस का कोई बड़ा संगठित जनसंपर्क अभियान जमीन पर दिखाई ही नहीं दे रहा, तो उनकी ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ से पार्टी के कार्यक्रमों में कमजोरी कैसे आ रही है? यानी हरदा यात्रा रोकने को तैयार हैं, लेकिन सवाल छोड़कर पीछे हट रहे हैं।
सैलजा की चिट्ठी के बाद हरदा ने बदला अंदाज
इस पूरे विवाद की शुरुआत कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की उस चिट्ठी से हुई, जिसमें उन्होंने हरीश रावत की प्रस्तावित यात्रा पर आपत्ति जताई थी। सैलजा ने कहा था कि यात्रा के बारे में न तो उनसे चर्चा हुई और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से। चुनाव नजदीक होने का हवाला देते हुए उन्होंने ऐसे किसी समानांतर कार्यक्रम को पार्टी के हित में नहीं बताया था।
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अब रावत के जवाब से साफ है कि वह इस मुद्दे को केवल पार्टी अनुशासन का मामला मानकर चुप बैठने के मूड में नहीं हैं।
उन्होंने अपनी पोस्ट में बताया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.सी. वेणुगोपाल से उनकी बात हुई थी और उन्होंने पूरी स्थिति स्पष्ट की थी। रावत के मुताबिक, उन्होंने आगे की यात्राएं रोकने पर सहमति जताई है, लेकिन पहले से तय कार्यक्रम को अचानक रोकना सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल के लिए ठीक नहीं होता।
‘मेरी यात्रा से कांग्रेस कमजोर कैसे हो रही है?’
हरीश रावत ने सीधे सवाल किया है कि लंबे समय से कांग्रेस का कोई संगठित जनसंपर्क अभियान जिलों, ब्लॉकों और ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में उनकी यात्रा से पार्टी के कार्यक्रमों में कमजोरी कहां आ रही है?
हरीश रावत का ये सवाल महज सफाई नहीं माना जा सकता है। एक तरह से हरदा ने कुमारी सैलजा से अपनी नाराजगी जता दी है। जाहिर है कि चुनावी साल में ये नाराजगी कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करेगी।
यह कांग्रेस के संगठन की सक्रियता पर सीधा राजनीतिक सवाल है।
रावत मूल रूप से यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी यात्रा कांग्रेस के समानांतर नहीं, बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच ही हो रही है। उनके मुताबिक हजारों कांग्रेसजन यात्रा में शामिल हुए और इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा।
ऐसे में सैलजा के ‘समानांतर कार्यक्रम’ वाले तर्क के सामने रावत ने अपना तर्क खड़ा कर दिया है।
अगर पार्टी का अपना बड़ा जनसंपर्क अभियान नहीं चल रहा, तो जमीन पर सक्रिय होने वाले नेता को रोका क्यों जा रहा है?
यही वह सवाल है जो आने वाले दिनों में कांग्रेस के भीतर राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।
यात्रा रोक दी, लेकिन हरदा ने ‘सरेंडर’ नहीं किया
हरीश रावत की पोस्ट का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत यही है। वह पार्टी के निर्देश को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे। उन्होंने साफ कहा है कि अगर कांग्रेस कोई समन्वित कार्यक्रम बनाती है तो वह अपनी आगे की यात्राएं स्थगित कर देंगे।
लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनकी राजनीतिक सक्रियता को केवल व्यक्तिगत कार्यक्रम बताना ठीक नहीं होगा। उनका दावा है कि यात्रा में कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ता शामिल हुए। पुराने और वरिष्ठ कांग्रेसजन उनसे मिले। पार्टी के महत्वपूर्ण चेहरे भी किसी न किसी रूप में यात्रा से जुड़े।
हरदा ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने असली चुनौती रख दी?
उत्तराखंड कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती चुनावी एकजुटता की है। पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के अपने प्रभाव क्षेत्र और समर्थक हैं। ऐसे में हरीश रावत की सक्रियता को लेकर नेतृत्व की चिंता समझी जा सकती है।
लेकिन दूसरी तरफ रावत का सवाल भी राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं है। अगर पार्टी चुनाव से पहले व्यापक जनसंपर्क अभियान चला रही है तो उसका रोडमैप क्या है?
अगर संगठन गांव-गांव पहुंचने की तैयारी में है तो उसका कार्यक्रम कहां है? और अगर पार्टी का ऐसा कोई बड़ा अभियान नहीं चल रहा, तो फिर हरीश रावत की यात्रा को संगठन के लिए खतरा क्यों माना जा रहा है?
7 अक्टूबर की मुलाकात पर नजर
हरीश रावत ने बताया है कि कुमारी सैलजा ने उन्हें 7 अक्टूबर की शाम मुलाकात का समय दिया है। रावत ने यह भी कहा है कि पार्टी को स्पष्टीकरण मांगने का पूरा अधिकार है और वह अपना पक्ष रखेंगे।
लेकिन अब यह मुलाकात सिर्फ एक नेता से स्पष्टीकरण लेने तक सीमित रहेगी या उत्तराखंड कांग्रेस की चुनावी रणनीति और रावत की भूमिका पर भी बात होगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा क्योंकि सैलजा की चिट्ठी ने जहां हरदा की यात्रा पर सवाल उठाया था, वहीं रावत की प्रतिक्रिया ने कांग्रेस की जमीन पर सक्रियता पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।