उत्तराखंड में हेलिकॉप्टर हादसे कोई नई बात नहीं रह गए हैं। सिस्टम की लापरवाही और यात्रियों को ऑफ द वे जाकर उड़ाने और पैसा कमाने की हेली कंपनियों की होड़ के सामने मानों उत्तराखंड का समूचा सिस्टम नतमस्तक हो चुका है। यहां हर हादसे के बाद कार्रवाई का दिलासा मिलता है और फिर कुछ समय बाद एक और हादसे की खबर मिलती है। ये सवाल अब यक्ष प्रश्न बन चुका है कि क्या इस राज्य में हेलीकॉप्टर हादसे रोके भी जा सकते हैं ?
शुक्रवार को चमोली में हुए हेलिकॉप्टर क्रैश के बाद भले ही सरकार, अधिकारी, समूचा सिस्टम ये बताने की कोशिश में लगा हुआ है कि राहत और बचाव कार्य पूरी तेजी से किए जा रहे हैं, SDRF की टीम समय पर रवाना हो गई लेकिन इस बात का जवाब कौन देगा कि अगर आधे राज्य में खराब मौसम का अलर्ट जारी है, धामों में बर्फबारी हो रही है तो फिर ट्रांस एअर को हेलि सर्विस ऑपरेट करने की अनुमति किसने दी ?
कैसे मिली उड़ान की इजाजत ? किसकी जिम्मेदारी होगी तय ?
चमोली में हेलीकॉप्टर क्रैश के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ट्रांस एअर को खराब मौसम के दौरान उड़ान भरने की इजाजत किसने दी ? गुरुवार को राज्य आपदा प्रबंधन और पुनर्वास सचिव विनोद सुमन ने बाकायदा एक बैठक कर खराब मौसम के बने हालात की समीक्षा की थी। यही नहीं पांच जिलों में आरेंज अलर्ट जारी किया गया था। गुरुवार को पूरे दिन बारिश होती रही। शुक्रवार के लिए चारधाम यात्रा मार्गों पर यात्रियों की सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता बरतने को कहा गया था। सरकारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक सचिव विनोद सुमन ने निर्देश दिए थे कि खराब मौसम या किसी संभावित खतरे की स्थिति में यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर रोका जाए। संबंधित अधिकारी यात्रा मार्गों की स्थिति पर लगातार नजर रखें और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लें।
इतने निर्देश, फैसले, समीक्षा के बावजूद आखिर कैसे हेली सेवा ऑपरेट हो रही थी ? या फिर ये माना जाए कि ये प्रेस विज्ञप्ति सिर्फ रस्म अदायगी थी ? या फिर ये मान लिया जाए कि हेली सर्विस देने वाली कंपनियां सचिव, सरकार, सिस्टम से ऊपर हैं और उनके लिए ये आदेश, निर्देश कोई माएने नहीं रखते हैं।
सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि उत्तराखंड में ऐसी सर्विसेज को मॉनिटर करने के लिए बाकायदा UCADA नाम का एक महकमा काम करता है। सचिव स्तर के अधिकारी से लेकर CEO तक तैनात हैं। इसके बावजूद हेलीकॉप्टर कैसे उड़ा ? क्या इसके लिए किसी की जिम्मेदारी तय होगी या फिर इस बार भी मुख्यमंत्री के एक बयान और जांच के दिलासे से ही काम चलाया जाएगा ?
बदनाम है Trans Air, पहले हुई कार्रवाई लेकिन नहीं आया होश
30 अक्टूबर को चमोली में जो हेलिकॉप्टर क्रैश हुआ है वो Trans Air संचालित करता है। Trans Air की हेलीकॉप्टर परिचालन पहले भी सवालों के घेरे में रहा है। दरअसल 15 जून 2025 को गौरीकुंड में एक विमान हादसा हुआ था। इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में मरने वालों में एक बच्चा भी शामिल था। दुर्घटनाग्रस्त विमान Aryan Aviation का था। इस हादसे के बाद चारधाम के लिए हेली सेवाएं तुरंत निलंबित कर दी गईं। यही नहीं इस हादसे के दिन ही Trans Bharat Aviation के दो हेलीकॉप्टर भी प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों में उड़ते पाए गए, जिसके बाद उनके दोनों पायलटों के लाइसेंस छह महीने के लिए निलंबित कर दिए गए थे। अब एक बार फिर Trand Air ने खराब मौसम में हेली सेवा जारी रखने के दुस्साहस किया और हादसा हो गया।
उत्तराखंड में हुए सर्वाधिक हवाई हादसे
28 जुलाई 2025 को राज्यसभा में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं पर लिखित जवाब दिया। इसमें पिछले पांच वर्षों में भारतीय पंजीकृत हेलीकॉप्टरों की दुर्घटनाओं का राज्यवार ब्योरा था। जवाब के मुताबिक उत्तराखंड में 7 दुर्घटनाएं दर्ज हुईं और 21 लोगों की जान गई। देशभर की 12 दुर्घटनाओं में से सात इसी राज्य में हुई थीं। अगस्त 2026 में लोकसभा में दिए गए एक और जवाब में मंत्रालय ने बताया कि 2023 से 2025 के बीच उत्तराखंड में छह हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं हुईं।
Aircraft Accident Inestigation Bureau यानी AAIB के मुताबिक राज्य में 2025 में चार बड़े हवाई हादसे हुए। AAIB ने विशेष तौर पर उत्तराखंड में चार धाम रूट पर होने वाली हवाई दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया है। AAIB की ओर से 13 अक्टूबर 2026 को जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में 2015 से 2025 के बीच चारधाम क्षेत्र की घटनाओं का अलग विश्लेषण किया है। इस अवधि में कुल 9 घटनाएं हुईं। 8 दुर्घटनाएं और एक गंभीर घटना (serious incident)। 2022 के बाद से हर साल कम से कम एक दुर्घटना या गंभीर घटना हुई है। 2025 में मई और जून के बीच ही चार दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें दो घातक थीं। रिपोर्ट के मुताबिक यह किसी एक साल की सबसे बड़ी संख्या है।
| 8 मई 2025 | गंगनानी, उत्तरकाशी | Bell 407 VT-OXF, Aerotrans Services | पायलट और पांच यात्रियों की मौत, एक यात्री गंभीर रूप से घायल |
| 17 मई 2025 | केदारनाथ हेलीपैड | AS350B2 VT-KBS, Pinnacle Air | एयर एम्बुलेंस की लैंडिंग के दौरान दुर्घटना, पायलट, डॉक्टर और नर्स सुरक्षित |
| 7 जून 2025 | सिरसी हेलीपैड | AW119MKII VT-RNK, Kestrel Aviation | टेकऑफ के तुरंत बाद हादसा, किसी की मौत नहीं, पांचों यात्री सुरक्षित |
| 15 जून 2025 | गौरीकुंड क्षेत्र | Bell 407 VT-BKA, Aryan Aviation | पायलट समेत सात लोगों की मौत |
25 फीसदी हादसों की वजह खराब मौसम
AAIB की ही रिपोर्ट बताती है उत्तराखंड में चार धाम रूट पर होने वाली 25 फीसदी हवाई दुर्घटनाएं खराब मौसम की वजह से होती हैं। 13 फीसदी हादसे ग्राउंड sop की अनदेखी से भी हो रहे हैं। विमानन क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि ग्राउंड sop और वेदर कंडीशन दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुईं हैं। कई बार उड़ान से पहले ग्राउंड पर ही मौसम की जानकारी, पूर्वानुमान, संभावित खतरों को नजरअंदाज किया जाता है और हेली सर्विस ऑपरेट की जाती है।
चूंकि उत्तराखंड के चारधाम मौसम में बदलाव के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं लिहाजा यहां अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत होती है लेकिन इसके बावजूद निर्धारित मानकों की भी अनदेखी कर दी जाती है।

संसद की स्थायी समिति भी उठा चुकी है सवाल
20 अगस्त 2025 को परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसद की स्थायी समिति (अध्यक्ष संजय कुमार झा) ने नागरिक उड्डयन क्षेत्र की सुरक्षा पर अपनी 380वीं रिपोर्ट पेश की। उसमें चारधाम हेलीकॉप्टर सेवाओं की सुरक्षा पर भी टिप्पणी है। समिति ने 2025 की चार दुर्घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि कठिन भूगोल, तेजी से बदलता मौसम और ज्यादा उड़ानों का दबाव जोखिम बढ़ाते हैं।
पर्वतीय उड़ान प्रशिक्षण की कमी
समिति ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में उड़ने वाले पायलटों के लिए विशेष पर्वतीय उड़ान प्रशिक्षण और प्रमाणन अनिवार्य नहीं है। DGCA के हवाले से समिति ने यह भी दर्ज किया कि UCADA के पास ज्यादा उड़ानों वाले संचालन की निगरानी के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन नहीं है।
DGCA और UCADA की जिम्मेदारी
UCADA राज्य स्तर पर चारधाम हेलीकॉप्टर सेवाओं का प्रबंधन करता है। ऑपरेटर का चयन, उड़ानों के स्लॉट, शेड्यूल और किराए की निगरानी। DGCA राष्ट्रीय नियामक है और सुरक्षा, एयरवर्थिनेस और नियामकीय कार्रवाई के लिए जिम्मेदार है। समिति के मुताबिक DGCA ने अपनी भूमिका को मुख्य रूप से लाइसेंसिंग और दिशा-निर्देश जारी करने तक सीमित बताया, और रोजमर्रा के संचालन पर सीधी, लगातार निगरानी नहीं दिखी। समिति का कहना है कि इससे दुर्घटना होने पर अंतिम जवाबदेही तय करना मुश्किल हो सकता है।
कार्रवाई ज्यादातर हादसों के बाद
समिति ने माना कि हादसों के बाद DGCA ने सुरक्षा चेकलिस्ट जारी की, ऑपरेटरों के विशेष ऑडिट किए, दो सेवा प्रदाताओं के संचालन पर रोक लगाई और केदारनाथ हेलीपैड पर उड़ानों की संख्या सीमित की। लेकिन इनमें से कई उपाय दुर्घटनाओं के बाद आए और व्यवस्था ज्यादातर प्रतिक्रिया पर टिकी रही। समिति ने ऐसी व्यवस्था की जरूरत बताई जिसमें जोखिम हादसे से पहले पहचाने जाएं।
समिति ने सिफारिश की थी कि हिमालयी क्षेत्र के पायलटों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट प्रशिक्षण और प्रमाणन अनिवार्य करना, और DGCA में ऊंचाई वाले हेलीकॉप्टर संचालन की निगरानी के लिए स्थायी विशेष इकाई।
लोकसभा में भी उठ चुका है मुद्दा
अगस्त 2026 में लोकसभा में दिए जवाब में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने हिमालयी क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर संचालन की सुरक्षा के लिए लागू व्यवस्थाएं गिनाईं। मंत्रालय के मुताबिक चारधाम उड़ानों में सैटेलाइट आधारित ट्रैकिंग अनिवार्य है और उसका फीड सहस्त्रधारा के इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर में रियल टाइम में देखा जाता है। हादसे की स्थिति में केंद्र को हेलीकॉप्टर की ताजा लोकेशन पता रहती है। उसी जवाब के साथ लगे ऑडिट निष्कर्षों में 2025 में ऑपरेटरों के किए गए विशेष सुरक्षा ऑडिट की कमियां दर्ज हैं। ऑपरेटर पायलटों के ड्यूटी समय (FDTL) की प्रभावी निगरानी नहीं कर रहे थे और Operations Circular 02/2023 का असरदार पालन नहीं हो रहा था। आंतरिक सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट और कार्रवाई रिपोर्टें DGCA को नहीं भेजी जा रही थीं। मेंटेनेंस पैकेज बंद करने की मानक प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी। उड़ानों के स्लॉट का समय व्यवस्थित ढंग से दर्ज नहीं किया गया। कुछ मौकों पर Airborne Image Recording System के डेटा का विश्लेषण नहीं हुआ। सहस्त्रधारा हेलीपोर्ट पर पायलटों का breath analyser टेस्ट विमान के पास खुले में होता था, क्योंकि इसके लिए तय जगह नहीं थी।(ये रिपोर्ट गौरीकुंड में हुए विमान हादसे के बाद आई लेकिन समूची व्यवस्था की पोल खोलती है)
अब बात जवाबदेही की
उत्तराखंड में लगातार हो रहे हवाई हादसों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जांच रिपोर्ट्स बताती हैं कि पहाड़ में मौसम और दृश्यता जल्दी बदलते हैं। छोटे हेलीपैड खतरनाक हो सकते हैं। बिजली की लाइन और ट्रॉली केबल भी जानलेवा हो सकते हैं। इसलिए पायलट का विशेष प्रशिक्षण, रियल टाइम मौसम जानकारी, भरोसेमंद संचार और उड़ान रोकने या लौटने का फैसला करना जरूरी है। सरकारों और नियामक ने SOP, मौसम उपकरण, कमांड सेंटर, सैटेलाइट ट्रैकिंग, विशेष ऑडिट और पायलट प्रशिक्षण के कदम गिनाए हैं और कई व्यवस्थाओं के लागू होने की जानकारी संसद को भी दी है। फिर भी AAIB की रिपोर्टों, संसदीय समिति की टिप्पणियों और सरकारी ऑडिट में इन व्यवस्थाओं को अमल में लाए जाने की कमियां दर्ज हैं।
इस हादसे के बाद फिर एक बार ये सवाल उठ रहा है कि आखिर उड़ान से पहले जोखिम का आकलन कौन करता है, मौसम बिगड़ने पर उड़ान रोकने का अधिकार किसके पास है, असुरक्षित हेलीपैड को संचालन की अनुमति कैसे मिलती है, और नियम टूटने पर जवाबदेही किस स्तर पर तय होती है।

