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दो दिन में भाजपा को दो झटके! बेनाम ने छोड़ी पार्टी, रामशरण नौटियाल कांग्रेस में शामिल, क्या बदलने लगी सियासी हवा?

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यशपाल बेनाम ने छोड़ी पार्टी, रामशरण नौटियाल कांग्रेस में शामिल

देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज होने लगी है। महज दो दिनों के भीतर भाजपा से जुड़े दो चर्चित चेहरों के पार्टी से अलग होने की खबर ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। 18 अक्टूबर को पौड़ी के पूर्व विधायक और पूर्व नगर पालिकाध्यक्ष यशपाल बेनाम ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया, तो 19 अक्टूबर को पूर्व भाजपा नेता रामशरण नौटियाल ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। नौटियाल प्रसिद्ध बॉलीवुड गायक जुबिन नौटियाल के पिता भी हैं।

इन दोनों घटनाक्रमों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या उत्तराखंड में भाजपा के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और प्रदेश की सियासी हवा बदलने लगी है, या फिर ये व्यक्तिगत नाराजगी, स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और चुनाव से पहले की सामान्य उठापटक के मामले हैं?

फिलहाल इन दो घटनाओं के आधार पर किसी व्यापक राजनीतिक बदलाव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले नेताओं के ये फैसले राजनीतिक दलों के लिए संकेत जरूर हैं कि संगठन के भीतर संवाद, सम्मान और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

पहला झटका: आठ साल बाद यशपाल बेनाम ने छोड़ी भाजपा

पौड़ी की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले यशपाल बेनाम ने 18 अक्टूबर को भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। वह करीब आठ साल तक भाजपा से जुड़े रहे। पार्टी छोड़ने के पीछे उन्होंने व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया और कहा कि वह अपने अगले राजनीतिक कदम के बारे में जल्द फैसला करेंगे।

बेनाम की राजनीतिक पहचान केवल भाजपा तक सीमित नहीं रही है। वर्ष 2007 में उन्होंने पौड़ी विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी। वह पौड़ी नगर पालिका के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। स्थानीय राजनीति में उनकी सक्रियता को देखते हुए उनके अगले फैसले पर नजर रहेगी।

सबसे अहम सवाल यह है कि क्या बेनाम किसी दूसरे दल में जाएंगे, निर्दलीय राजनीति की ओर लौटेंगे या कोई नया राजनीतिक रास्ता चुनेंगे? अभी तक उनके अगले कदम की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

इसलिए उनके इस्तीफे को सीधे किसी दूसरे दल के पक्ष में जाने या भाजपा के चुनावी आधार में कमी के प्रमाण के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसका राजनीतिक असर उनके अगले फैसले और पौड़ी में उनके समर्थन के वास्तविक स्वरूप से ही स्पष्ट हो सकेगा।

दूसरा झटका: रामशरण नौटियाल ने फिर थामा कांग्रेस का हाथ

पहले घटनाक्रम के अगले दिन, 19 अक्टूबर को रामशरण नौटियाल कांग्रेस में शामिल हो गए। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी कुमारी सैलजा, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य सहित पार्टी के नेता इस दौरान मौजूद रहे।

रामशरण नौटियाल पहले कांग्रेस में रह चुके हैं। करीब 2014 में वह भाजपा में शामिल हुए थे। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें चकराता सीट से उम्मीदवार बनाया था, जहां उनका मुकाबला कांग्रेस के प्रीतम सिंह से हुआ था।

भाजपा छोड़ने के बाद नौटियाल ने संगठन में अनुशासन की कमी और सार्वजनिक मंचों पर अपमानित किए जाने की बात कही थी। ये उनकी ओर से लगाए गए आरोप हैं। उनकी कांग्रेस में वापसी से यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना अगला राजनीतिक कदम चुन लिया है, लेकिन इससे चकराता या आसपास के क्षेत्रों में चुनावी समीकरण कितने बदलेंगे, यह अभी तय नहीं है।

क्या भाजपा के भीतर बढ़ रहा है असंतोष?

दो दिनों में सामने आए इन घटनाक्रमों को एक साथ देखें तो संगठन और स्थानीय नेतृत्व के संबंधों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। रामशरण नौटियाल ने पार्टी छोड़ने के पीछे संगठनात्मक व्यवहार को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की, जबकि यशपाल बेनाम ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया।

फिर भी भाजपा के लिए यह घटनाक्रम आत्ममंथन का विषय हो सकता है कि चुनाव से पहले स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेताओं की नाराजगी को किस तरह संभाला जाए। दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए नौटियाल की वापसी संगठन को स्थानीय स्तर पर सक्रिय करने का अवसर हो सकती है। हालांकि, किसी भी दल को वास्तविक चुनावी लाभ तभी मिलेगा, जब ये राजनीतिक घटनाक्रम मतदाताओं के समर्थन में भी दिखाई दें।

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2027 का चुनाव: क्या इन इस्तीफों का पड़ेगा असर?

उत्तराखंड की राजनीति में नेताओं का दल बदलना कोई नई बात नहीं है। चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरण बदलते रहे हैं। कभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं इसकी वजह बनती हैं, तो कभी टिकट की उम्मीद, संगठनात्मक मतभेद, स्थानीय प्रभाव या वैचारिक असहमति।

इस बार इन दो घटनाओं को समझने के लिए कुछ सवाल अहम हैं:

  • स्थानीय समर्थन: क्या यशपाल बेनाम और रामशरण नौटियाल अपने साथ समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भी जोड़ पाएंगे?
  • संगठन की प्रतिक्रिया: क्या भाजपा अपने असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाएगी?
  • कांग्रेस की रणनीति: क्या पार्टी इन घटनाक्रमों को संगठन विस्तार और स्थानीय राजनीतिक पकड़ मजबूत करने में बदल पाएगी?
  • मतदाताओं का रुख: क्या नेताओं के पार्टी छोड़ने का असर स्थानीय मतदाताओं की पसंद पर भी पड़ेगा?

इन सवालों के जवाब अभी सामने आने बाकी हैं। केवल दो नेताओं के फैसलों से पूरे प्रदेश में राजनीतिक हवा बदलने का दावा करना तथ्यों से आगे जाना होगा।

सियासी हवा बदल रही है या चुनावी उछलकूद?

दो दिनों में भाजपा से जुड़े दो चर्चित चेहरों का अलग होना निश्चित रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय है। यशपाल बेनाम ने पार्टी छोड़कर अपने विकल्प खुले रखे हैं, जबकि रामशरण नौटियाल कांग्रेस में लौट चुके हैं। दोनों घटनाएं भाजपा के लिए राजनीतिक असहजता पैदा कर सकती हैं, लेकिन इनके चुनावी प्रभाव का आकलन अभी नहीं किया जा सकता।

सियासी हवा बदलने का संकेत तब ज्यादा स्पष्ट होगा, जब पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की संख्या बढ़ने के साथ जमीनी कार्यकर्ताओं का रुख बदले, स्थानीय संगठनों में असंतोष सामने आए और मतदाताओं के व्यवहार में भी बदलाव दिखाई दे।

फिलहाल तस्वीर इतनी ही है कि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। आने वाले दिनों में दूसरे नेताओं के फैसले, दलों की संगठनात्मक प्रतिक्रिया और स्थानीय स्तर पर बनने वाले नए समीकरण बताएंगे कि यह महज चुनावी उछलकूद है या किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत।

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